Wednesday, March 28, 2012
लगता है डर अगर......
लगता है डर गर आईने से इतना तो मुझे मिटा दो तो ज़रा,
खन्ज्र्र ना सही हाथों में, नकाब ही हटा दो तो ज़रा !!
तेरे इंतज़ार में दुआ माँगने को नहीं उठे हैं हाथ बरसों से,
खुदा के वास्ते कभी अपनी नज़र ही उठा दो तो ज़रा !!
खन्ज्र्र ना सही हाथों में......!!
आपके इशरत-ए-इस्वा-करी* पर हँसे ना कोई तो और क्या ?
लाखों कस्में याद ना सही, के इकक वादा ही निभा दो तो ज़रा !!
खन्ज्र्र ना सही हाथों में.......!!
समाँ यों दुशवार* नहीं रहता सदा गुलज़ार में, ए अज़ीम*-ए-चमन,
बेहिस्त*-ए-गुलिस्ताँ में आ जाएगी बहार, तुम शर्मा दो तो ज़रा !!
खन्ज्र्र ना सही हाथों में नकाब ही हटा दो तो ज़रा !!
तबीयत खरी हो चली थी उसके बगैर इकक अरसे से,
बस्ती में आए हैं वो आज, के चेहरे पेर नकाब गिरा दो तो ज़रा !!
खन्ज्र्र ना सही हाथों में.......!!
उन्हें ये डर के भरी बzम में ये आँखें झलक़ ना उठें कहीं,
मैं कब से पत्थर बना बैठा हूँ, आदमी बना दो तो ज़रा !!
खन्ज्र्र ना सही हाथों में.......!!
गिरा था मयखाने में तो बेशुमार हाथ बढ़े आए थे उठाने को,
अब तो शराब का भी असर नहीं साक़ी तुम ही गिरा दो तो ज़रा !!
खन्ज्र्र ना सही हाथों में.......!!
तेरे हुनर के जलवे सुने तो हैं हमने भी बहुत के आज
समंदर में डूब गया हूँ, के मोती बना दो तो ज़रा !!
खन्ज्र्र ना सही हाथों में.......!!
नहीं चाहता कोई खिदमत "प्रेम" इस जहाँ-ए-बेदाद से,
तुम मेरे नाम से मेरा तखलुस्स ही मिटा दो तो ज़रा !!
खन्ज्र्र ना सही हाथों में.......!!
लगता है डर गर आईने से इतना तो मुझे मिटा दो तो ज़रा.....
<इशरत-ए-इस्वा-करी=खुद को चालक समझने से मिलने वाली खुशी>
<दुशवार=मुश्किल> <अज़ीम=रक्षक> <बेहिस्त=स्वर्ग>
Thursday, February 9, 2012
मियाँ समझा करो ....!!
मयखाने जाकर वाइज़ और साकी में यों ना उलझ जाया करो
आईना सामने रखकर खुदा और खुद में फ़र्क़ समझा करो !!
यों नहीं के जबाब नहीं तुम्हारे सवालों का हमारे पास,
मैं चुप इसलिए रहता हूँ अक्सर के तुम समझा करो !!
सुना है फकीरों के काफिले में शामिल हो गया है इकक मुसाफिर,
तुम हुनर की पहचान के लिए पहले सादगी को समझा करो !!
हर एक को दोस्त कह देने में बुराई नहीं कोई,
मगर तुम दोस्त और महबूब में फ़र्क़ समझा करो !!
बहुत लाज़िम है आशिक़ी में बेवफ़ाइयों के तोफे,
मगर किसी का दिल दुखाने से पहले दिल्लगी समझा करो !!
रिज़्क-ए-शोहरत के मोहताज़ होंगे वो नामगार लोग,
तुम कभी कबार गुमनाम फकीरों की जूस्तजू समझा करो !!
मैं सदिओं से गर्दन झुकाए खड़ा रहा हूँ तेरे मंदिर में,
हर एक दुआ हाथ फैलाकर नहीं माँगी जाती , समझा करो !!
यों सर-ए-आम महफ़िल में सवाल करके ज़लील ना करना,
अब जवां हो चले हो तुम, समझा करो !!
शिकायत करना तो मोहोबत की तोहीन होती है ,
मियाँ, इश्क़ में खामोशी की एहमियत समझा करो !!
हर शाम आशियाँ में फाफिल हो सो जाने से कहाँ मिलता है सुकून,
किसी बेघर नाशाद को सीने से लगा उसका दर्द समझा करो !!
ऐसा हुनर नहीं "प्रेम" तुझमें के आला शायरी करे तू,
उसने कहा था इकक बार, हमारी ज़ुबानी लिखा करो !!
आईना सामने रखकर खुदा और खुद में फ़र्क़ समझा करो !!
Monday, December 26, 2011
आप ही से
ये नूर, ये मयकशी; ये शब्नम, ये शराब, आप ही से !!
इशरत-ए-मोहोबत तो हर दिन मिली मगर,
आँखें मिली आँखों से, आप ही से..!!
मैं भटकता रहा हर दम दो लफ़्ज़ों की तालाश में,
गज़ल बनी तो आप ही से...!!
नहीं छुपती छुपाए ये दास्ताँ किसी से,
कहूँ मगर कैसे के हो गई है मोहोबत आप ही से..!!
ना क़ुरान पढ़ी ना सजदा, ना नमाज़ की अदा कभी,
मंदिर मस्जिद काबा सब आप ही से..!!
नादां थे हम जो फूल सितारों से सज़ा रहे थे,
रौनक आई घर में, आप ही से..!!
उम्र भर दर बदर ढोकरें खाता रहा हूँ मैं,
मेरी ज़िंदगी का ठिकाना, आप ही से..!!
सादगी देखिए तो ज़रा हमारी,
आपकी शिकायत करते हैं आप ही से (सुमित माफी चाहूँगा !!)
मंज़र दिखे तो तसल्ली हो "प्रेम" तुझे,
क्या खबर, सुकून मिले तो आप ही से !!
Tuesday, September 27, 2011
दिल लगाने के बाद
हमने मोहोबत की थी जिनसे दुनिया आज़माने के बाद,
वही शक्श दिल दुखा गया आज फिर इकक ज़माने के बाद |
कोई दुश्मनी नहीं हमारी इन अंधेरों से यों तो मगर,
ना जाने कहाँ गुम जाता है वो शक्श शाम ढल जाने के बाद |
सोचा था के इस घर को ताज बनाऊंगा में भी कभी,
ना बँगला बना, ना दयार बचा , इक्क ज़माना गुज़र जाने के बाद |
बस्ती वालों के आँगन में अंधेरा ना देख सका मैं उस दिन,
राख को हाथ पर रखकर रोया बहुत , घर जलाने के बाद |
तू मुझसे वो गुज़रे वक़्त की बातें ना कर आज
गुफ्तगू करूँगा ज़रूर मगर, वो पुराने खत जलाने के बाद |
मयखाने से बिन पिए लौट जाने वालों में हम नहीं साकी,
पीयेंगे छा कर मगर, आतिश-ए-गम सुलग जाने के बाद
तुझमें और चाँद में फ़र्क़ है तो बस इतना सा
वो दगा करता तो है मगर, रात गुज़र जाने के बाद |
अपनी बzम में हमारा ज़िक्र ना कर बैठना कभी कहीं ,
सौ बातें करेंगे ज़माने वाले , तुम्हारे चले जाने के बाद |
अच्छा होता जो तुम्हें कभी हमसे मोहोबत ना होती,
तगाफूर करने लगते . लोग अक्सर दिल लगाने के बाद |
वो तेरी शिद्दत में सदीयाँ गुजारने की बातें कर रहा था उधर अफ़सोस,
ज़िंदगी से वफ़ा ना कर सका "प्रेम" तेरे बेवफा होने के बाद |
Wednesday, February 9, 2011
सुखनवर
मुसाफिर दरिया का रंग देखता रहा दिनभर इधर
उफान-इ-कश्ती-इ-माझी गाफिल हो बह गया इधर |
पढने लगा था बहुत इल्म से जबीं-इ-लकीरों को,
वो इश्क-इ-समंदर में डूब मोती बन गया इधर |
मैं अपने घर में खुदा को पूजता रहा मगर,
दुनिया वालों की नज़र में कातिल बन गया उधर |
तेरी तालाश में ही गया था ,क्या खबर,
साकी भी न मिला और पैमाना भी खो गया उधर |
उन्हें ये डर , के मैं गर्दिश-इ-दहर में जाऊँगा किधर ?
जहाँ कदम रखता गया , रास्ता बनता गया उधर |
लज्ज़त-इ-फ़साना-मोहोबत्त में वक़्त गुज़र गया कुछ
वो खंज़र लिए इंतज़ार करता रहा उधर |
उनके नक्श-इ-हुस्न के सामने पिया था ज़हर,
उम्र दो दफा और बढ़ गई शायद उधर |
ना चश्म-इ-नीर, ना दर्द-इ-दिल किया बयां जिधर,
दीवार पैर नाम उनका लिख चुपचाप आ गए उधर |
दो आखार लिखकर ही जला दिया वो पन्ना अमूमन,
कहीं लोग उम्दा सुखनवर ना समझने लगें "प्रेम" तुझे उधर |
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गाफिल=senseless
इल्म=knowledge
जबीं=forehead
गर्दिश-इ-दहर=world full of difficulties
फ़साना=story
नक्श-इ-हुस्न=the portrait of beauty
चश्म-इ-नीर=tears flowing out of eyes
सुखनवर=poet
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Sunday, November 7, 2010
पुरानी यादें

वो शिकन भरी आँखों से देखते थे, हम मोहोबत समझ लिया करते थे,
गुनाह कोई और किया करता था, सज़ा हम भुगत लिया करते थे |
जानते थे मंसूबे उनके,जो वो कर एक एहसान गिना गिना कर किया करते थे
फ़र्क़ इतना था ह्में इंतेहा मोहोबत थी , और वो इंतेहा तगफूर किया करते थे |
फकीर की आरजू ना पूछ कभी, तन्हाइयों में पला बढ़ा है वो,
सोचिए तो ह्श्र उनका जो कभी महफ़िलों में जिया करते थे |
नहीं पीता कोई शौक से, जमाने से निगाहें छुपाकर,
वो और दिन थे जा वो ह्में थाम कर पिलाया करते थे |
दूर कहीं किसी घर में दिया जलते देखकर अचंभा हुआ बहुत,
वो दौर गुज़र गया जब हमारी बस्ती वाले भी उजाले किया करते थे |
लड़खड़ाते कदमों को सहारा देना तो मेयखाने की अलामत है लेकिन,
कीजिएगा क्या उन कदमों का जो, गिरने के लिए ही पिया करते थे |
मुह ढका गया है तेरा उसी कफ़न से, जिससे वो परदा किया करते थे,
दफ़न किया जा रहा है तुझे "प्रेम" वहीं, जहाँ वो अक्सर तुझसे फरेब किया करते थे |
Friday, October 29, 2010
मालूम नहीं

दिया जलाते-जलाते जल गई उंगलियाँ कब , मालूम नहीं
खाव्ब में क्या आए वो आज, हो गई सहर कब, मालूम नहीं....!!!
(सहर- morning time)
दौर गुज़र गया वो जब मुलाकात के बहाने ढूंढता था
तुझसे मिलकर कहूँगा क्या, किया है इंतज़ार कितना , मालूम नहीं ???
लाख झूठ कहे होंगे तुमने, एक और सही.
मेरे नाम का ज़िक्र हुआ महफ़िल में अगर, तो कह देना मालूम नही.....
इकक घूँट और पी लेने दे साकी आज चैन से,
किसी और रोज़ करेंगे हिसाब , कितनी पी शराब, आज मालूम नहीं
ना दिल में रही कोई उम्मीद , ना तुम्हारे जबाव का इंतज़ार कहीं,
जानता हू तुम कहोगी फिर वही, मालूम नहीं.......!!
खुदा तेरे इरफ़ान पर जिंदा है दुनिया , तेरी असलियत मगर कोई जानता नहीं
पूछा किसी ने उलफत का अंजाम तो कह दिया, मालूम नहीं ???
(इरफ़ान- cleverness; उलफत- love)
साकी तू ही बता मेरा कल, खुदा में तो अपना भरोसा नहीं,
पूछे कोई वाइज़ से उसका मुताकबल,तो कहेगा वो भी , मालूम नहीं
(मुताकबल- future)
उम्र भर लगा रहा "प्रेम" तेरे घर का रास्ता खोजने
हश्र ये के अब अपने घर का भी रास्ता मालूम नहीं.......
मालूम नहीं,,,,,मालूम नहीं ..... !!!
Thursday, May 20, 2010
अब रात नहीं बाकी (Ghazal)
"अब रात नहीं बाकी"
पोंछ लूं मैं आँखें अपनी, के अब रात नहीं बाकी,
दो दिन गुज़रे नहीं और वो कह दिए, कोई मोहोबत नहीं बाकी !!
खुद ही के सवालों में उलझा रहता हूँ अक्सर,
के जवाब उनका सुनने की अब ताकत नहीं बाकी !!
अँधेरा होते ही , घर की ओर चल देता हूँ अमूमन ,
के रौशनी मैं घर जाने की हिम्मत नहीं बाकी !!
जाने क्यों ये लोग सहमे से ही जी रहे हैं ,
उनकी इक्क नज़र काम कर चुकी, अब कोई क़यामत नहीं बाकी !!
मैं खुद ही से बदले लेता आ रहा हूँ ,
ज़माने से हाथ चार करने की हिम्मत नहीं बाकी !!
सुना है उन्होंने आज बहुत अश्क बहाए,
मिला होगा मेरे नाम का आधा अधूरा ख़त कहीं बाकी !!
बहुत चालाकी से वो अपना काम कर गए , मगर,
बहुत चालाकी से वो अपना काम कर गए , मगर,
खंजर लाश पे गिरा रहा और वो समझे , कोई सुबूत नहीं बाकी !!
उनकी बस्ती कोई हमने इबादतगाह बना दिया,
खुदा तुझसे दुआ मांगने को अब कोई इबादत नहीं बाकी !!
तू पैमाने की गौर कर, इस महखाने की गौर कर,
ज़ख्मों पे महरम लगाने के लिए तेरी जरूरत नहीं साकी !!
इक्क दफा फिर गौर फरमायें .......
तू जाम ना भरने की बात न कर हमसे,
तू जाम ना भरने की बात न कर हमसे,
मत भूल के तू महखाने से है , महखाना तुझसे नहीं साकी !
"प्रेम" तेरे जीने मरने से क्या फर्क पड़ता है किसी को ?
तेरे कफ़न पे अश्क बहाने वाला अब कोई नहीं बाकी......!!
पोंछ लूं मैं आँखें अपनी, के अब रात नहीं बाकी..............!!
Monday, February 8, 2010
बेज़ुबाँ वक्त
Wednesday, February 3, 2010
Husn-e-taareef !!
बात करें तो जैसे ग्ज़लों का फस
खूब कहा है किसी ने,
देखा जिसने माह जमाल आपका ये हु
कैसे ना हो वो मुस्ताकबिल आपका
मस्त निगाहें आपकी ; मदहोशी का पैमाना !!
घड़ी-दो-घड़ी देखा करें हमारी त
इन आईनों में रखा क्या है ?
क्यों संभालते फिरते हैं ज़ुल्
आने दीजिए तूफानों को,
मालूम तो पड़े,
इन खामोशियों का गिला क्या है ?
खुले आम इस कद्र निकला ना करें,
मनचले देखकर हुस्न वालों को, शोर शराबा मचाते हैं |
अपनी नहीं फिक्र तो कम-से-कम, इ
गुज़रेगी क्या उन राहगारों पे, जो यहाँ आते जाते हैं !!!
कोई देख ना ले खुली ज़ुल्फ़ें आ
यहाँ लोग तूफानों से घबराते हैं
देखते हुस्न वालों को शोर शराबा
देखे से आपके जो हलचल मचे,
बेआरज़ू होके अलहा-अलहा कहें |
मत कार ज़ुल्म इतना ए ज़ालिम,
के ऊपर वाला देखे अदायें तुम्हा
खुद को हकीर-ए-मूर्त कहे !!
बेबस होके वो भी अलहा-अलहा कहे,
वो भी अलहा अलहा कहे !!
(1.बेआरज़ू -- without any specific demand. In poem's context take it as: People are shouting अलहा-अलहा .Generally they cry in order to ask sth from Him. But they are not having any demand once they see her .HOpe you understand
गुज़ारिशें करते रहे,
दुआयें मांगते रहे,
मन्नतें भी मांगी बहुत,
मगर खुदा को कहाँ मंज़ूर थी खा
भेजा उनको महखाने में,
किलकारियाँ मारी लोगों ने बहुत
'प्रेम' ब्यान क्या करे अब,
हुस्न-ए-तारीफ आपकी?
हुस्न-ए-तारीफ आपकी , बताने को,
अभी भी महखाने में शराबी हैं बह
हमने तो मन्नतें मांगी थी,
फिर भी किलकारियाँ मारी लोगों न
किलकारियाँ मारी लोगों ने बहुत
(1.किलकारियाँ -- To shout loudly like a mad
Thursday, January 21, 2010
परदा उठा बैठे!!
चाँद लगा शर्माने,
तारों टिमटिमा कर करो एहतराम,
वो लगें हैं परदा उठाने!!
शराबियों ने भर-भर के जाम भर लि
महखाने भी लगे गज़लें गाने;
वाइज़ों मन्न्तें माँगो खुदा से
के वो परदा लगे हैं उठाने!!!
कोई संभाले हूमें आज़,
तूफान लगे हैं आने;
सुना था के हलचलें होती हैं,
तबाही होती है......
लहरें उठती हैं समंदर में,
सनसनी आवाज़ें होती हैं!!
आज़ होश ही किसे है बस्ती में?
सुना है कि अमावस शाम को आते है
बस्ती में उनकी इनायतें होती है !!!
आए क्या वो पल दो पल शहर में,
हर जगह उजाले हो गये!
दुनिया वाले देखते रहे उन्हें,
पलकें झपक झपक क्रर्,,,,
उनके जाते ही मालूम पड़ा,
हम तो पलकें झपकना ही भूल गये!!
उनके इधर रहते रहते ,
कोई संभाल ले हमें ....
जाते ही उनके, महखाने से,
ये मदभरा प्याला टूट जाएगा ,!!
"सुकून-ए-जाम" भरने दो आज,
फिर महखाने में ऐसा सकी , खुदा जाने कब आएगा ??
महफिल में जो वो आए आज़,
होश ही खो बैठे,,
"दीदार-ए-ज़ुल्मत" होते ही ,
"होश वालों" से उनका पता पूछ बैठे !!
दोस्तों ने संभाला भी कुछ कद्र
अफसोस !!
अफसोस, के रकीब भी मौजूद थे वहीं,
जो उनका परिचय दे बैठे !!
बची हुई जान भी निकल गई उस वक्त,
जब भारी महफिल में वो परदा उठा
भारी महफिल में वो परदा उठा बैठे !!
Thursday, June 25, 2009
Yadein Bani Yaadgaar........

खुदा से मांगते हैं तुम्हें हरदम,
ऐ काश के आज मुद्दत हो जाए।
जिंदगी का पल- पल बीता है कैसे,
तमाम यादों के बाद , इक्क यादगार हो जाए..........!!
दुआ मांगते हैं दुनिया वाले,
अपनों के लिए.....
हमनें मांगी मुद्दतें जिंदगीभर,
बेगानों के लिए;
कबूल कर लें तमाम गुनाह अपने,
जो तू सजा देने आ जाए।
तमाम यादों के बाद, इक्क यादगार हो जाए......
मुनासिब ये भी है ,
के जिंदगी शाम हो जाए;
शमा जलती है अक्सर शाम के बाद,
तू चाहे तो ये शाम ,
इक्क जाम हो जाए।
तमाम यादों के बाद, इक्क यादगार हो जाए........
सजाये हैं कितने की खाव मैंने ,
पलकें हैं बेताब,
हकीकत में न सही ,
ज़हन में जो तू आए।
देंगी दुआएं ये पलकें हज़ार,
बंद आंखों में भी जो तू सामने आए।
तमाम यादों के बाद, इक्क यादगार हो जाए.......
यादगार हो जाए.............!!!
Saturday, May 2, 2009
Inteha - A tribute to Jagjit Singh !!
चाहते तो बेपनाह हैं,
कहने से डरते हैं।
गुपचुप बात भी करते हैं,
मगर इकरार करने से डरते हैं।
डरते हैं शराफत से उनकी,
नजाकत से उनकी डरते हैं,
इज़हार तो करें हम मगर,
उनकी जुदाई से डरते हैं........ !!!
अपना न बना सके उन्हें,
मोहोबत भी की थी अथह हमनें,
मगर बता न सके कुछ उन्हें.........
बिछड़ने मिलने का खौफ किसे ??
उनकी बेवाफी से डरते हैं ,
मोहोबत तो करें हम इनतेहा ,
मगर उनकी जुदाई से डरते हैं।
कुछ तो बात रही होगी,
यों ही बेताबी नहीं छा जाती।
रुतवा जवानी का ढला नहीं अभी ,
फ़िर भी हालात-ऐ-अंजाम से डरते हैं।
इज़हार तो करें हम,
मगर उनकी जुदाई से डरते हैं।
उनके सजने संवरने की फिदरत,
खुदगर्ज़ अदाओं से डरते हैं।
मोहोबत तो करें इनतेहा हम,
मगर उनकी जुदाई से डरते हैं..... !!!
देहलीज़ पर खड़े रह गए,
मासूमियत से उनकी हम डरते हैं,
जिंदगी और मौत तो आने जाने हैं,
खौफ क्या होता है,
हम तो उनकी मदभरी आंखों से डरते हैं.........
मोहोबत तो करें इनतेहा हम मगर
उनकी जुदाई से डरते हैं........
उनकी जुदाई से ...................... !!!
Thursday, April 16, 2009
Sandesa unke naam
गुनाहगार कहें लोगों से , हमें, वो अगर
कोई गम नहीं।
बेदर्द दिल को खंजर से मारें, खरोंचें वो अगर
कोई गम नहीं।
मोहोब्बत का नाम बेईज्ज़त न करें,
हमें चाहे सूली पर चढा दें वो अगर,
कोई गम नहीं................ !!
इकरार न किया करें वो अगर,
शरमा के नज़रें न झुकाया करें वो अगर,
बेचैन निगाहों में, बहें ना अश्क,
अश्कों में धुली आंखों में आँखें डाल,
दीदार तो करें वो अगर.......... !!
खामोशी बनी मेहरबां,
सूनापन बना मोहताज़,
जज्बात को काबू में रखें तो हम मगर,
वो यादों में मासूमियत दिखाया न करें,,
बेकरारी खत्म करें अब हम,
तरसती निगाहों पर तरस खाएं वो अगर.......... !!!
यादों की दस्तक से हो गया परेशान,
चंद नई यादें बनाने आयें वो अगर,
कहते हैं लोग , लैला और मजनू, नई दास्ताँ लिखें, जो वो गुनगुनाएं तो अगर .............. !!
मर ही गए होते तेरे चाहने वाले,
मर ही गए होते तेरे चाहने वाले...... जो पल्लू सरकता सरकता , कंधे से नीचे , गिरता जो अगर,
फनकार बन गए होते, जहाँ-ऐ-इश्क में, मिलने का मौका दिया होता जो अगर।
अंधेरों मैं भटकने के हम न होते कायल,
बेखुदी वो इक बार समझे होते वो अगर............ !!
Thursday, April 9, 2009
Broken Hearts !

महफिलों में रहते थे कभी ,
आज जुदाई मिली है....
मोहोबत करके एक बेवफा से,
बेवफाई मिली है |
गम इस जुदाई का नहीं,
न उनकी रुसवाई का गम है |
काश न मिले होते उन्हें कभी,
के मुझे तन्हाई मिली है|
करके मोहोबत इक बेवफा से,
बेवफाई मिली है |
रातों को जवा होते देखता हूँ,
(गौर फरमायें)
रातों को जवा होते देखता हूँ,
के वो चाँद सी दिखती है !!!!
ज़माना वो भी था,
जब हाथों में हाथ होते थे,
के अब तो मोहोबत के पनघट पे ,
तन्हाई मिलती है |
वकत की मार है,
और कुछ नहीं |
पहले तस्वीर में उनकी ,,,,,,शराब नज़र आती थी......
पहले तस्वीर में उनकी ,शराब नज़र आती थी
अब शराब में, तस्वीर उनकी नज़र आती है ।
आज जाम न भर ऐ साकी,
के इन प्यालों से उनकी याद आती है |
नज़रें बिखर जाती हैं उनकी कहीं,
जब हम सामने नज़र आते हैं,
और एक हम हैं !!!
आँखें ही नी झपकटी, के जब वो याद आते हैं !!!
इंतज़ार नहीं करता मैं अब,
ये तो मेरी तकदीर बनी है ,
लम्हा लम्हा कैसे गुजरता है ??
शराब से नहीं,
साकी से नहीं,
महखाने से पूछो,
के जहाँ उनकी तस्वीर बनी है ।
करके मोहोबत इक बेवफा से ,
तन्हाई मिली है
तन्हाई मिली है..........!!
Monday, February 23, 2009
Guzaarish Muskurahat ki !!
उन लम्हों की यादों में,
हम रातों को जवान बना दें,
चाहत मैं उनकी
हम हर गम को भुला दें.
न वादा न इकरार.......
इक्क बार मुस्कुरा के तो दिखा दें
उनकी हंसीं के लिए हम खुदा को भुला दें !!!
तमन्ना -ऐ-इकरार मचल जाए
अगर वो आने का वादा कर दें....!!
आसमान -ऐ- इश्क में ,
हवाओं का रुख बदल दें ...
बात न सही ,
वादा ही कर दें
उसी के सहारे हम ज़िन्दगी बिता दें !!!
काश के उन्होंने
मुड़कर उस कदर देखा न होता,
वो कातिलाना पल्लू सहराया न होता ,
जो वो जुल्फों को बिखरा दें हम तूफानों को भुला दें !!
उनकी हंसीं के लिए
हम खुदा को भुला दें.................. !!!
कह दे कोई उन्हें
हमें परेशान न किया करें ,,
तनहाइयों का आलम है ,, यादें न बना करें !!
इश्क होता नहीं कर किसी से...
पलक झपककर कभी ,,,
गली की इस नुक्कड़ को भी देखा करें !!
बात न सही,
वादा न सही
खुदा के लिए , मुस्कुराया तो करें............. !!!
खौफ हमें वफ़ा का नहीं ,
इधर तो तनहाइयों का आलम है ...
हाल जो यह दिल का है ॥
कोई बता न दे उन्हें कहीं !!
जिगर से तो न लग सके,,, नज़र से गुम् जाने का आलम है !!!
इधर तो ...............बेवफ़ाइयों का आलम है.......!!!!
मोहल्ले की चौखट से गुजरते गुजरते,
पलकें न झुकाया करें ,
हाल ये दिल का ऐसा न होता
कोई कह दे उन्हें,,,
इस कदर शरमाया न करें,,,,,,,,
उनकी हंसीं के लिए हम खुदा को भुला दें ......
के वो मुस्कुराया तो करें !!! मुस्कुराया तो करें !!!!






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