Tuesday, September 27, 2011

दिल लगाने के बाद



हमने मोहोबत की थी जिनसे दुनिया आज़माने के बाद,
वही शक्श दिल दुखा गया आज फिर इकक ज़माने के बाद |

कोई दुश्मनी नहीं हमारी इन अंधेरों से यों तो मगर,
ना जाने कहाँ गुम जाता है वो शक्श शाम ढल जाने के बाद |

सोचा था के इस घर को ताज बनाऊंगा में भी कभी,
ना बँगला बना, ना दयार बचा , इक्क ज़माना गुज़र जाने के बाद |

बस्ती वालों के आँगन में अंधेरा ना देख सका मैं उस दिन,
राख को हाथ पर रखकर रोया बहुत , घर जलाने के बाद |

तू मुझसे वो गुज़रे वक़्त की बातें ना कर आज
गुफ्तगू करूँगा ज़रूर मगर, वो पुराने खत जलाने के बाद |

मयखाने से बिन पिए लौट जाने वालों में हम नहीं साकी,
पीयेंगे छा कर मगर, आतिश-ए-गम सुलग जाने के बाद

तुझमें और चाँद में फ़र्क़ है तो बस इतना सा
वो दगा करता तो है मगर, रात गुज़र जाने के बाद |

अपनी बzम में हमारा ज़िक्र ना कर बैठना कभी कहीं ,
सौ बातें करेंगे ज़माने वाले , तुम्हारे चले जाने के बाद |

अच्छा होता जो तुम्हें कभी हमसे मोहोबत ना होती,
तगाफूर करने लगते . लोग अक्सर दिल लगाने के बाद |

वो तेरी शिद्दत में सदीयाँ गुजारने की बातें कर रहा था उधर अफ़सोस,
ज़िंदगी से वफ़ा ना कर सका "प्रेम" तेरे बेवफा होने के बाद |

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